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Showing posts from August, 2023

संवाद

हाल ही में भारत ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में जो उपलब्धि हासिल की है उससे हम सभी भली भांति परिचित है। इसने जहां एक ओर विश्व में भारत की छवि को और प्रगाढ़ किया है वहीं हमें विचार करने के कई सारे दृष्टिकोणों से भी रुबरू कराया है जो हम सभी के अपने अपने अनुसार अलग-अलग हो सकता है। वह चाहे ISRO की मेहनत का हो या निरंतर प्रयासरत रहना हो या फिर भारत का अंतरिक्ष के क्षेत्र में बढ़ता वर्चस्व हो किंतु इस सबके साथ जो एक अन्य दृष्टिकोण उभरता है वह है संवाद यानी संपर्क। हम सभी जानते हैं की पिछले साल मिशन   चंद्रयान 2 के पूर्णरूप से सफ़ल न होने का एक ही कारण था कि लैंडर से हमारा संपर्क टूट चुका था और इस बार  मिशन  चंद्रयान 3 की सफलता के मायने भी कहीं न कहीं संपर्क यानी संवाद पर ही टिके हैं, लैंडर हमें अगले 14 दिनों में चांद की जो भी जानकारियां भेजेगा उसका अध्ययन करके चांद के अन्य रहस्यों के बारे में भी पता किया जाएगा।    यह तो बात हुई चंद्रयान की जो खुद में विलक्षण है, अदभुत है। किंतु यदि इसी को जीवन से जोड़कर देखें तो हमें यहां संवाद के असल मायने पता चलते है। सं...

पुस्तक समीक्षा ( जीवन के अर्थ की तलाश में मनुष्य ) ।

विक्टर ई. फ्रैंकल द्वारा लिखित तथा वॉव ( Wow ) पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक Man's Search for Meaning अर्थात् ' जीवन के अर्थ की तलाश में मनुष्य'  लेखक और उसके साथियों के उस संघर्ष को दर्शाती है जो उन्होंने जर्मनी के निर्दयी शासक हिटलर के आश्विज तथा नाज़ी शिविरों में जीवित रहने के लिए किया। पुस्तक में बंदी शिविर के भयावह अनुभवों के साथ साथ लोगोथेरेपी का संक्षिप्त वर्णन तथा ' ट्रैजिक ऑप्टिमिजम' यानी दुखद आशावाद पर भी चर्चा की गई है।     जहां आज के समय में हर एक व्यक्ति अपने जीवन का उद्देश्य या यूं कहे की अपने जीवन का 'क्यों' ढूंढना चाहता है ऐसे में यदि हम इस पुस्तक के माध्यम से लेखक की सुने तो उनका यही कहना है की यदि हमारे ' जीवन का क्यों हमें पता है तो हम किसी भी प्रकार के कैसे को सहन कर सकते हैं   फिर वह क्षणिक हो या दीर्घकालिक'।      लेखक के अनुसार अपने जीवन के अर्थ की तलाश करना किसी भी व्यक्ति के जीवन का सबसे बड़ा कार्य है। लेखक ने बंदी शिविर के प्रथम दिवस से लेकर, बंदियों के मनोविज्ञान , शिविर में जिंदा रहने के लिए किए गए संघर...

पर्यावरण संरक्षण

पर्यावरण संरक्षण एक ऐसा विषय जिसके बारे में सुनना हमारे लिए एक आम बात हो गई है। बचपन से और आज तक, बच्चों से लेकर बड़ों तक हम सभी भली भांति जानते हैं की पर्यावरण संरक्षण क्या है और इसकी कितनी महत्ता है लेकिन क्या हम व्यक्तिगत रूप से इस पर अमल करते हैं? क्या अपने व्यक्तिगत स्तर पर कोई कदम उठाते हैं? वैश्विक स्तर पर भले ही कितनी ही बातें, समझौते और सम्मेलनों का आयोजन किया जाए।किन्तु वास्तव में जब तक हम में से प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर जागरूक और जिम्मेदार नहीं होगा तब तक कुछ भी पूर्ण रूप से कारगर साबित नहीं हो सकता।    जब भारत की बात करते हैं तो यहां की विविधता , यहां की संस्कृति , और यहां की जीवनशैली हमें हमेशा पर्यावरण और उससे जुड़ी हर एक वस्तु की रक्षा करने का संदेश देती है। हमारे प्राचीन शास्त्रों से लेकर हमारी विभिन्न जनजातियां आज भी पर्यावरण को पूजते हैं। वृक्ष हो, पशु हो, सूर्य हो या चंद्रमा इन सबकी आराधना करना भी एक प्रकार से हमें इनके संरक्षण करने की ओर ही इंगित करता है।       बात शास्त्रों की हो, विज्ञान की हो या फिर हमारी दैनिक दिनचर्या की, ...

प्रेमचंद और स्त्री विमर्श ।

पिछले महीने 31 जुलाई को ' कलम के सिपाही' और हिंदी साहित्य के अग्रणी लेखकों में शुमार मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती को हम सभी ने मनाया। यूं तो उनके विचारों की प्रसंगिकता समाज में आज भी उतनी ही है जितनी की 100 वर्षों पहले थी लेकिन जब हम आज उन्हें पढ़ते हैं तो उनकी कहानियों और रचनाओं में जो स्त्री विमर्श की गहराईया मिलती हैं वो हृदय और मस्तिष्क दोनों को झकझोर कर देती है। वह चाहे ' कफ़न' हो, ' गोदान' हो या उनकी लिखी कहानी 'आधार'  हो इन सभी में उन्होंने महिलाओं की जिस स्थिति का चित्रण किया है वह हृदय को कुरेद देता है और यह सोचने पर विवश करता है की क्या आज भी समाज की इस दशा में कोई सुधार आया है ? क्या महिलाएं आज अपने लिए खुद निर्णय लेने में सक्षम हैं? क्या आज भी उन्हें खुद से पहले समाज के प्रति सोचना पड़ता है?    उनकी कहानी आधार को ही ले उसमें जिस तरह से दो महिलाओं की एकता समाज के प्रश्न चिन्हों के आगे आकर ठोस जवाब बन जाती है यह वास्तव में पाठक को सुकून से भर देता है और खुद एक दूसरे का मजबूत आधार बन कर समाज के दायरों से आगे निकल जाती हैं  यह बयां करता है...