Posts

Showing posts from February, 2023

*मेरु प्यारु उत्तराखंड*

   *मेरु प्यारु उत्तराखंड* ऊंचा डांडा कांठा यख, जीवन प्यारू बारामासा यख, हंसी खुशी अर प्यार प्रेम मा, दाना स्याणो कु आशीर्वाद च यख, बिराणों तें अपड़ू बड़े दयों यन खास चमत्कार च यख, मोक्ष अर पुण्य की धरती दगड़ी चारों धामों कु वास च यख, जिंदगी की चुनौतियों मा, मेहनत कु अंबार च यख, देश विदेशों ते आकर्षित करदी, यन प्यारी सौगात च यख, देवभूमि का नौ से प्रसिद्ध जग मा, यन आध्यात्मिक बात च यख, हर एक का दिल मा बस जो यन पर्यटन की भरमार च यख, बर्फीलु हिमालय दगड़ी, गंगा की शीतलता च यख, हरया भरया बुग्याल छीन त, फूलों की घाटी जन उद्यान भी यख, पहाड़ जन मजबूत हौसला छीन त, प्यार भी बेशुमार च यख, सांस्कृतिक विवधता की चमक  मा एकता की स्वाणी झलक च यख...!   प्राची डिमरी

शिव

प्राचीन काल से ही हमारा देश भारत अपनी विविधता में एकता के लिए प्रसिद्ध है फिर चाहे यह विविधता सांस्कृतिक हो या आध्यात्मिक, हमारे जीने के तरीकों में हो या परमात्मा से जुड़ने के तरीकों में हो या फिर परमात्मा के अलग-अलग रूपों को पूजने के तरीकों में हो। हमारे देश भारत में अलग-अलग मान्यताओं के अनुरूप लोग अलग अलग देवों की पूजा-अर्चना अलग-अलग ढंग से करते हैं इन्हीं रूपों में से एक रूप है शिव,  शिव यानी कल्याण , शिव यानी प्रकृति , शिव यानी योगी , शिव यानी संतुलन , शिव यानी अनंत । जहां एक और विष धारण है तो वहीं दूसरी ओर चंद्रमा की  शीतलता भी है। प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता बाघाम्बर है तो शक्ति का साथ भी है।     वास्तव में देखा जाए तो किसी भी देव की आराधना करना एक प्रकार से प्रकृति की आराधना करना है। शायद यह प्रथा ही प्रकृति ने पैदा की हो ताकि प्रकृति की रक्षा हो सके और मनुष्य के मन में एक भय की भावना भी बची रहे। शिव का अर्थ कल्याण होता है और यह तभी संभव है जब केवल धरातल पर आराधना छोड़ थोड़ी गहराई में जाने की कोशिश करे। जीवन में कल्याण का मार्ग संतुलन और योग ध्यान से ह...

प्रकृति और हम

"प्रकृति में गहरी नजरों से देखो और तब आप हरेक चीज को अच्छे से समझेंगे।" --- अल्बर्ट आइंस्टीन क्या हम कभी सोचते हैं की जिस खुली हवा और खुले वातावरण में हम रह रहें हैं उसे बचाऐ रखना कितना जरूरी है? क्या हम कभी वास्तविकता में अपने और प्रकृति के संबंध और संतुलन के बारे में सोचते हैं? शायद नहीं और अगर कुछ लोग सोचते भी हैं तो उस दिशा में कितने कदम उठा पाते हैं यह चिंतनीय है।     सृष्टि में हर वस्तु संतुलन के आधार पर टिकी है संतुलन के थोड़ा सा बिगड़ते ही बड़े-बड़े नुकसान और हानियां हो जाती है। जितना आसान संतुलन के बारे मे कहना या सुनना है उतना ही मुश्किल है इसे बनाए रखना फिर चाहे वो जीवन हो या प्रकृति।     विकास की राह पर बढ़ते हमारे कदम कहीं न कहीं हमारे इस संतुलन को बिगाड़ने का कारण बनते जा रहे हैं। हम अपने लाभ के लिए प्रकृति का दोहन करते ही जा रहे हैं इस सब के बीच हम यह भूल रहे हैं की जिस प्रकार हमें अपने स्व की चिंता है उसी प्रकार प्रकृति भी अपने मैं और मेरो की फिक्र करती है और अपने संतुलन का बीड़ा खुद उठाती है।     प्रकृति हमें विभिन्न संकेतों के माध्यम...