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वसंत ..!

वर दे वीणा वादिनि वर दे, पुष्पों की ताजगी सा तन मन भर दे, नव संकल्प दे, नव हौसले दे , बासंती परिधान सा तरोताजा कर दे, नव पथ दे, नव बुलंदियां दे, नएपन की खूबसूरती से जीवन भर दे, नव ज्ञान दे,  नव धैर्य दे, सुरों की झंकार सा नव जीवन गान दे, नव विवेक दे, नव बुद्धि दे, कुसुमाकर के सौंदर्य से चेतना को भर दे, नव गीत दे, नव उमंग दे, सूर्य की किरणों सा नव तेज दे, नव शब्द दे,  नव अर्थ दे, बुद्धि को नव चेतना से भर दे, नव दृष्टि दे, नव रूप दे, धरा के नव रूप के रस से हृदय भर दे...! प्राची डिमरी

महिलाएं अपने लिए कम सोचती है..!

महिलाएं खुद के बारे में कम सोचती हैं, जैसे वक्त सबके लिए, अपने लिए कम, ख़्याल सबका,  अपना कम, वक्त बेवक्त भी मौजूद रहती हैं सबके लिए, पर अपने लिए कम, उन्हें खुद पर वक्त जाया करना खर्च और दूसरों पर जाया करना पूंजी लगता है, उनकी प्राकृतिक रचना भले ऐसे न हुई हो, पर उनकी मानसिक रचना ऐसे हो जाती है, वे बहुत बोलती हैं सबसे, पर खुद से कम, बहुत करती हैं सबके लिए, पर अपने लिए कम, इस ज्यादा और कम में  वो अपना हिस्सा ढूंढना  हमेशा भूल जाती हैं, वे हमेशा पास होती हैं सबके, पर खुद से दूर,  सुनती सबकी हैं, पर अपनी कम, सबकी ज़िंदगी आसान बनाती हैं, पर खुद चैन की सांस लेने को व्यर्थ मानती हैं, वे इस आसान और व्यर्थ के बीच, अपने लिए ठहरना भूल जाती हैं, अपनी बातों को अनकहा,  अनसुना ही रहने देती हैं, महिलाएं खुद के बारे में कम सोचती हैं..! प्राची डिमरी

बिहार चुनाव में लोकतंत्र का चेहरा...!

हाल ही में हुए बिहार चुनाव और उसके परिणामों से लगभग लगभग हर जागरूक नागरिक परिचित होगा। जहां NDA को 2 तिहाई से ज्यादा बहुमत मिलने से वह बहुत बड़ी पार्टी के रूप में उभरी तो वहीं इस चुनाव ने लोकतंत्र के बदलते स्वरूप के ओर भी इशारा किया है। जहां एक ओर महिलाएं और युवा वर्ग अब चुनाव का केंद्र बनते नज़र आए तो इसी के साथ इस चुनाव प्रचार में जाति और धर्म से जुड़े प्रचार भी पहले की अपेक्षा काफी कम हुए। यह हमारे लोकतंत्र के सशक्त रूप को प्रदर्शित करता है। राष्ट्र के किसी भी जिम्मेदार नागरिक के लिए यह काफी महत्वपूर्ण है लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं होती सिक्के के दो पहलू की तरह इसका भी एक अन्य पहलू है। इसका दूसरा पहलू इशारा करता है लोकतंत्र में बढ़ती मुफ्त घोषणाओं (freebies) की।    बिहार में जहां सत्ताधारी पार्टी ने महिलाओं के खाते में दस दस हजार रुपए मुफ्त में भेजने की घोषणा की और कुछ के खातों में तो वोटिंग से पहले भेज भी दिए गए। तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टी का हर एक घर में पच्चीस हजार देने की घोषणा हमें बताती हैं कि कैसे यह मुफ़्त खोरी की इच्छा लोकतंत्र को कमजोर करती जा रही है...

प्रभात

स्वच्छ नीले आकाश का  सुर्ख लाल होना धीमे धीमे, बादलों का यूं  चमकना धीमे धीमे, चिड़ियों की चहचहाट का  स्वर बढ़ना धीमे धीमे, रात्रि की शांति का भंग होना धीमे धीमे, कुछ नया रचने की कोशिश का  आगाज होना धीमे धीमे, जीवन का फिर से रफ्तार  पकड़ना धीमे धीमे, सूरज का खिड़की पर दस्तक देना धीमे धीमे, नई सुबह का आगाज़ होना धीमे धीमे, नई ऊर्जा का संचार होना धीमे धीमे.....! प्राची डिमरी 

आर्थिक विभेदीकरण

प्राचीन काल हो या 21 वीं सदी का आधुनिक काल हो भारतीय समाज में हर काल में आर्थिक विभेदीकरण की मौजूदगी रही है । वर्तमान हो या प्राचीन काल आर्थिक समृद्धि कभी भी निचले तबके तक पूर्ण रूप से नहीं पहुंच पाई। जब भारत को सोने की चिड़िया के नाम से जाना जाता था तब भी आम जन मानस का जीवन आर्थिक दृष्टि से बहुत अच्छी स्थिति में नहीं था और यहीं हमारे समाज की सबसे बड़ी कमी बनती गई जिससे हम आज तक उबर नहीं पाए हैं जिस कारण से आम जनमानस आज भी अभावों का जीवन जीता है और आर्थिक सुदृढ़ीकरण केवल अभिजात्य तबके तक ही सीमित दिखती है।    भले ही हमारी अर्थव्यवस्था आज 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन गई है हमने जापान जैसे विकसित राष्ट्र को पीछे छोड़ दिया किंतु अपने समाज में गहरी पैठ बनाई इस समस्या का हम आज तक निदान नहीं कर पाए।  वैश्विक खाद्य सुरक्षा सूचकांक (Global Food Security Index) 2024 में हमारी स्थिति यह है कि हम 127 देशों में से 105 वें स्थान पर हैं।  विश्व प्रसन्नता सूचकांक( World Happiness Index ) 2025  में भी हम  147  देशों में से  118 वें  स्थान पर ...

चिंतनीय विषय..!

हमारे देश में बहुत से लोगों की यह आदत होती है कि वे अपने दिन की शुरुआत चाय और अखबार के साथ करते है लेकिन जब दिन की शुरुआत में ही हृदय को झकझोर देने वाली सुर्ख़ियो से सामना होता है तो वह फिर महिला हो या पुरुष दोनों के लिए चिंतनीय विषय बन जाता है कि एक ओर वो सुर्खियां ओर दूसरे ही ओर नवरात्र की धूमधाम की ख़बरें। हमारे देश में यह कितने विरोधाभास की स्थिति है कि एक ओर हम अमृत काल में विकास के नए नए संकल्प ले रहे हैं, अंतरिक्ष तक अपनी उपलब्धियों को प्रसारित कर रहे है तो वहीं दूसरी ओर आज भी देश की आधी आबादी यानी महिलाएं आए दिन जघन्य अपराधों का शिकार होती जा रही हैं।  हम अंतरिक्ष तक तो पहुंच गए पर धरती पर रह रही आधी आबादी को उनकी आजादी, उनके अधिकार, उनका सम्मान उन्हें पूरी तरह नहीं दे पाए।   असमंजस तो तब होता है जब हम अपनी आस पास की महिलाओं को तो सुरक्षित महसूस नहीं करा पाते उनकी असुरक्षा का कारण खुद होने के बाद भी उनको ही दोषी करार देते हैं और जब नवरात्रि के नौ दिनों में देवी के नौ रूपों की बड़े आडंबर पूर्ण रूप से पूजा अर्चना करते हैं खुद के घर की महिलाओं का अनादर करके दूसरे क...

कविता

कविता करती है कम,  रूह के दर्द को  एक दवाई की तरह, छू लेती है हृदय की गहराइयों को  शब्दों की विशालता से, रच डालती है  भावनाओं के नए गीत, और थिरक उठता है तन मन, झंकृत करती है  मन के मृत पड़े तारों को सृजित होता जीवन में एक नया संगीत..! प्राची डिमरी