चिंतनीय विषय..!

हमारे देश में बहुत से लोगों की यह आदत होती है कि वे अपने दिन की शुरुआत चाय और अखबार के साथ करते है लेकिन जब दिन की शुरुआत में ही हृदय को झकझोर देने वाली सुर्ख़ियो से सामना होता है तो वह फिर महिला हो या पुरुष दोनों के लिए चिंतनीय विषय बन जाता है कि एक ओर वो सुर्खियां ओर दूसरे ही ओर नवरात्र की धूमधाम की ख़बरें। हमारे देश में यह कितने विरोधाभास की स्थिति है कि एक ओर हम अमृत काल में विकास के नए नए संकल्प ले रहे हैं, अंतरिक्ष तक अपनी उपलब्धियों को प्रसारित कर रहे है तो वहीं दूसरी ओर आज भी देश की आधी आबादी यानी महिलाएं आए दिन जघन्य अपराधों का शिकार होती जा रही हैं। हम अंतरिक्ष तक तो पहुंच गए पर धरती पर रह रही आधी आबादी को उनकी आजादी, उनके अधिकार, उनका सम्मान उन्हें पूरी तरह नहीं दे पाए।
  असमंजस तो तब होता है जब हम अपनी आस पास की महिलाओं को तो सुरक्षित महसूस नहीं करा पाते उनकी असुरक्षा का कारण खुद होने के बाद भी उनको ही दोषी करार देते हैं और जब नवरात्रि के नौ दिनों में देवी के नौ रूपों की बड़े आडंबर पूर्ण रूप से पूजा अर्चना करते हैं खुद के घर की महिलाओं का अनादर करके दूसरे की घर की कन्याओं को पूजते हैं तो यह हमारे समाज के दोगल पन को पूर्ण रूप से प्रदर्शित करता है।
   देखा जाए तो धार्मिक मान्यताएं भी कहीं न कहीं हमारे संस्कारों से जुड़ी होती हैं यह मानव व्यवहार के दायरे को समझाती हैं पर शायद हम इनकी वास्तविकता को या तो समझते नहीं हैं या फिर समझकर भी अनजान बनने की कोशिश करते हैं क्योंकि शायद अनजान बनकर हम खुद को झूठी तसल्ली देते हैं कि इस चीज़ का अस्तित्व ही नहीं है। यह हमें आडंबर का तो हिस्सा बना रहा पर मन से हम खोखले होते जा रहे हैं नवरात्रि मनाए खूब धूमधाम से मनाए लेकिन ऐसे अवसर आत्म अवलोकन के लिए भी अच्छे अवसर होते हैं विचार करें कि क्या कभी मेरे किसी भी छोटे विचार, फैसले या किसी कृत्य से किसी लड़की या महिला के आत्मसम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ठेस पहुंची ?
    यदि उत्तर हां में मिले तो अपनी इस गलती को सुधारने का प्रण लें और आगे इसे कभी न दोहराने का संकल्प भी लें । इस नवरात्रि पर यही सच्चा नवरात्र पूजन होगा।

प्राची डिमरी

Comments

  1. बहुत खूब... 🖊👍सुंदर लेख डिमरी जी।

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