बिहार चुनाव में लोकतंत्र का चेहरा...!

हाल ही में हुए बिहार चुनाव और उसके परिणामों से लगभग लगभग हर जागरूक नागरिक परिचित होगा।
जहां NDA को 2 तिहाई से ज्यादा बहुमत मिलने से वह बहुत बड़ी पार्टी के रूप में उभरी तो वहीं इस चुनाव ने लोकतंत्र के बदलते स्वरूप के ओर भी इशारा किया है।
जहां एक ओर महिलाएं और युवा वर्ग अब चुनाव का केंद्र बनते नज़र आए तो इसी के साथ इस चुनाव प्रचार में जाति और धर्म से जुड़े प्रचार भी पहले की अपेक्षा काफी कम हुए। यह हमारे लोकतंत्र के सशक्त रूप को प्रदर्शित करता है। राष्ट्र के किसी भी जिम्मेदार नागरिक के लिए यह काफी महत्वपूर्ण है लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं होती सिक्के के दो पहलू की तरह इसका भी एक अन्य पहलू है। इसका दूसरा पहलू इशारा करता है लोकतंत्र में बढ़ती मुफ्त घोषणाओं (freebies) की।
   बिहार में जहां सत्ताधारी पार्टी ने महिलाओं के खाते में दस दस हजार रुपए मुफ्त में भेजने की घोषणा की और कुछ के खातों में तो वोटिंग से पहले भेज भी दिए गए। तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टी का हर एक घर में पच्चीस हजार देने की घोषणा हमें बताती हैं कि कैसे यह मुफ़्तखोरी की इच्छा लोकतंत्र को कमजोर करती जा रही हैं और इसके लिए कितना बड़ा संकट बनती जा रही हैं। इन मुफ़्त घोषणाओं की एक झलक न्यूयार्क के मेयर चुनाव में भी दिखती है न्यूयार्क जैसे शहर में भी लोग इन लोक लुभावन मुफ़्त घोषणाओं की ओर आकर्षित होते दिखाई देते हैं।
    यह किसी भी राष्ट्र के लोकतंत्र के लिए चिंताजनक बात है कि सरकारें कल्याणकारी राज्य के निर्माण के नाम पर हर चुनाव में ऐसे लोक लुभावन वायदे करती हैं लेकिन इसके गहरे में जनता को लुभाना और वोटों का ही लालच होता है। भारत की बात करे तो हमारी राज्य सरकारे खुद कर्जे में डूबे हुए भी इस तरह की घोषणाएं करती सुनाई देती हैं। इसके बजाय यदि वे नागरिकों को इतना सशक्त बनाने पर जोर देती तथा ऐसी कल्याणकारी योजनाओं के निर्माण में जोर देती की जनता खुद इन सारी चीजों को प्राप्त करने के योग्य बन जाये तो वह होगी वास्तविक कल्याणकारी राज्य के निर्माण की परिकल्पना जो लोकतंत्र को कमजोर नहीं बल्कि और सशक्त बनाए। 

प्राची डिमरी 

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