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बिहार चुनाव में लोकतंत्र का चेहरा...!

हाल ही में हुए बिहार चुनाव और उसके परिणामों से लगभग लगभग हर जागरूक नागरिक परिचित होगा। जहां NDA को 2 तिहाई से ज्यादा बहुमत मिलने से वह बहुत बड़ी पार्टी के रूप में उभरी तो वहीं इस चुनाव ने लोकतंत्र के बदलते स्वरूप के ओर भी इशारा किया है। जहां एक ओर महिलाएं और युवा वर्ग अब चुनाव का केंद्र बनते नज़र आए तो इसी के साथ इस चुनाव प्रचार में जाति और धर्म से जुड़े प्रचार भी पहले की अपेक्षा काफी कम हुए। यह हमारे लोकतंत्र के सशक्त रूप को प्रदर्शित करता है। राष्ट्र के किसी भी जिम्मेदार नागरिक के लिए यह काफी महत्वपूर्ण है लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं होती सिक्के के दो पहलू की तरह इसका भी एक अन्य पहलू है। इसका दूसरा पहलू इशारा करता है लोकतंत्र में बढ़ती मुफ्त घोषणाओं (freebies) की।    बिहार में जहां सत्ताधारी पार्टी ने महिलाओं के खाते में दस दस हजार रुपए मुफ्त में भेजने की घोषणा की और कुछ के खातों में तो वोटिंग से पहले भेज भी दिए गए। तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टी का हर एक घर में पच्चीस हजार देने की घोषणा हमें बताती हैं कि कैसे यह मुफ़्त खोरी की इच्छा लोकतंत्र को कमजोर करती जा रही है...

प्रभात

स्वच्छ नीले आकाश का  सुर्ख लाल होना धीमे धीमे, बादलों का यूं  चमकना धीमे धीमे, चिड़ियों की चहचहाट का  स्वर बढ़ना धीमे धीमे, रात्रि की शांति का भंग होना धीमे धीमे, कुछ नया रचने की कोशिश का  आगाज होना धीमे धीमे, जीवन का फिर से रफ्तार  पकड़ना धीमे धीमे, सूरज का खिड़की पर दस्तक देना धीमे धीमे, नई सुबह का आगाज़ होना धीमे धीमे, नई ऊर्जा का संचार होना धीमे धीमे.....! प्राची डिमरी