आर्थिक विभेदीकरण

प्राचीन काल हो या 21 वीं सदी का आधुनिक काल हो भारतीय समाज में हर काल में आर्थिक विभेदीकरण की मौजूदगी रही है । वर्तमान हो या प्राचीन काल आर्थिक समृद्धि कभी भी निचले तबके तक पूर्ण रूप से नहीं पहुंच पाई। जब भारत को सोने की चिड़िया के नाम से जाना जाता था तब भी आम जन मानस का जीवन आर्थिक दृष्टि से बहुत अच्छी स्थिति में नहीं था और यहीं हमारे समाज की सबसे बड़ी कमी बनती गई जिससे हम आज तक उबर नहीं पाए हैं जिस कारण से आम जनमानस आज भी अभावों का जीवन जीता है और आर्थिक सुदृढ़ीकरण केवल अभिजात्य तबके तक ही सीमित दिखती है। 
  भले ही हमारी अर्थव्यवस्था आज 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन गई है हमने जापान जैसे विकसित राष्ट्र को पीछे छोड़ दिया किंतु अपने समाज में गहरी पैठ बनाई इस समस्या का हम आज तक निदान नहीं कर पाए। वैश्विक खाद्य सुरक्षा सूचकांक (Global Food Security Index) 2024 में हमारी स्थिति यह है कि हम 127 देशों में से 105 वें स्थान पर हैं। विश्व प्रसन्नता सूचकांक(World Happiness Index) 2025 में भी हम 147 देशों में से 118 वें स्थान पर ही हैं। हालांकि मानव विकास सूचकांग(H.D.I) 2025  में 2022 की अपेक्षा भारत ने अपनी स्थिति में सुधार किया है और 133 वें स्थान से 130 वें स्थान पर पहुंचे किंतु अभी भी हमें इसमें बहुत सुधार करने की आवश्यकता है।  इन सभी सूचकांकों को प्रभावित करने वाले कई कारक में से एक आर्थिक विभेदीकरण भी है जिसका गहरा प्रभाव भारत की प्रगति और विकास पे पड़ रहा है। यह भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था की बड़ी विडंबना कही जा सकती है। 
  यदि प्राचीन काल की बात करे यूरोपीय यात्री फिज़ और बर्नियर जब मुगल काल के दौरान भारत आए तो उनके अनुसार जब वे भारत आए थे उस काल में भारत तत्कालिक पेरिस और लंदन से भी बड़ा था किन्तु समाज में आर्थिक विभेदीकरण तब भी मौजूद था।
यूरोपीय यात्री फिज़ लिखते हैं कि ---"अकबर के समय में आगरा और फतेहतेपुर दोनों लंदन से बड़े थे "। बर्नियर लिखते है कि --- "17 वीं सदी में दिल्ली पेरिस से भी बड़ा था तथा आगरा दिल्ली से भी बड़ा था।" लेकिन उस समृद्धि का भी आम जनमानस को बहुत अधिक लाभ नहीं मिल पाता था। अंग्रेजों के आने के बाद तो आम जनता त्रासदी झेल ही रही थी किंतु उनके आने से पूर्व भी उनके हाल कोई बहुत अच्छे नहीं थे। 
   इस प्रकार आर्थिक विभेदीकरण ही समाज में एक बड़ा अंतर पैदा करता है और समाज को दो भागों में बांट देता है एक आधिक्य में जीवन जीता है और एक अभाव में। भारत जब तक इस अंतर से पार नहीं पाता तब तक यह हमारे विकास में बाधक बनता रहेगा। सही मायनों में विकास की मंज़िल का पहला कदम इसे ही दूर करना है।

प्राची डिमरी 
रुद्रप्रयाग उत्तराखंड

Comments

  1. Great 👍 you have diverse knowledge..you write very well👍👏

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