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पहाड़ै नारी (गढ़वाली कविता)

पहाड़ै नारी (गढ़वाली कविता) पहाड़ै नारी पहाड़ सी जन होंदिन, ह्यूँद मा अपरु सूरज खुद बढ़दिन त, रूडी कु छैल भी खुद ही होंदीन, कभी घर बार,कभी घास,कभी गौरु त कभी पुंगड़ा पटला, यूं सभ्यों का बीच बस हर दिन पिसदी रौंदीन, अपरी इच्छा अपरा सपना तै बच्चों मा ढूंढ़दिन, अपरी हृदय विराटता से सब चुनौतियों तै धूल मा मिलोंदीन  अर बात ओ जब अपरी त, अरे मि थे कि वे मैं ठीक चौं   हर बार बोल्यांदीन, अपरु गौ से प्यारु वि थै कुछ नि लग दु अर अपुर पहाड़ जन सुकून वि तै कख नि मिलूंदु, सच मा पहाड़ै नारी पहाड़ सी जन होंन्दीन मजबूत,स्थिर अर दृढ़, वीं की पीड़ा हर क्वि नि समझ सकदू  व पहाड़ै नारी च वीं का जन क्वी व्हे नि सकदू। प्राची डिमरी

शहर के दो रूप

शहर के दो रूप होते हैं, एक सुंदर सुव्यवस्थित और शांत, जहां दिखती है चकाचौंद हर तरह, जहां होता आलीशान पन हर तरफ, जहां होता है ऐसों आराम और  जीवन की विलासिता.., जहां व्यक्ति का सम्मान उसके अहौदे  से देखा जाता है.., जहां मानवीय मूल्य अपनी जड़े खोते से जाते हैं.., जहां अपनेपन की दूर, तक बात नहीं हो पाती है वहीं दूसरा रूप होता है कुछ भिन्न, वहां दिखती है जीवन की भाड़ दौड़, जहां होती है मेहनत की बूंद हर चेहरे पर, जहां आराम से नाता बचपन में ही टूट जाता है, जहां मस्तियां नहीं  बचपन में ही जिम्मेदारियाँ नज़र आती हैं, आलीशानपने से दूर यह, छोटी छोटी झोपड़ियों में बस जाती है, शहर के दो रूप होते हैं और शायद जीवन के भी...! प्राची डिमरी