पहाड़ै नारी (गढ़वाली कविता)
पहाड़ै नारी (गढ़वाली कविता) पहाड़ै नारी पहाड़ सी जन होंदिन, ह्यूँद मा अपरु सूरज खुद बढ़दिन त, रूडी कु छैल भी खुद ही होंदीन, कभी घर बार,कभी घास,कभी गौरु त कभी पुंगड़ा पटला, यूं सभ्यों का बीच बस हर दिन पिसदी रौंदीन, अपरी इच्छा अपरा सपना तै बच्चों मा ढूंढ़दिन, अपरी हृदय विराटता से सब चुनौतियों तै धूल मा मिलोंदीन अर बात ओ जब अपरी त, अरे मि थे कि वे मैं ठीक चौं हर बार बोल्यांदीन, अपरु गौ से प्यारु वि थै कुछ नि लग दु अर अपुर पहाड़ जन सुकून वि तै कख नि मिलूंदु, सच मा पहाड़ै नारी पहाड़ सी जन होंन्दीन मजबूत,स्थिर अर दृढ़, वीं की पीड़ा हर क्वि नि समझ सकदू व पहाड़ै नारी च वीं का जन क्वी व्हे नि सकदू। प्राची डिमरी