पहाड़ की नारी 2

वह ठंड में अपना सूरज खुद बनती है तो गर्मी की छांव भी अपनी खुद ही होती है,
वह जानती है मुस्कुराना उस उहापोह में भी,
वह रहती है मदमस्त बिना किसी सराहना के भी,
वह पहाड़ पर रहकर पहाड़ सी हो जाती है,
मजबूत हौसले,मजबूत इरादे और मजबूत जिजीविषा से
खुद को भर लेती है..
तभी तो वो सिर्फ नारी नहीं पहाड़ की नारी कहलाती है।
वह जीवन नहीं देखती तलहटी पर बैठ के,
वह जीवन को देखती है पहाड़ की चोटी से...
विशाल,विराट और भव्य रूप में,
वो नहीं हारती छोटी छोटी मुश्किलों से... 
वो पहाड़ की तरह अडिग रहकर उन से भी पार पा जाती है,
और पहाड़ की तरह ही कुर्बानी में भी वो सबसे आगे होती है,
परिवार, बच्चे और न जाने क्या क्या किस किस में बटती रहती है...
लेकिन फिर भी
कभी परिवार,कभी समाज, तो कभी अपने ही बच्चों में अपने वजूद के लिए लड़ती रहती है,
पहाड़ की नारी न जाने क्या क्या सहती है..!

प्राची डिमरी 

Comments

  1. Amazing✍️✨🙌

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  2. Well written dear... Go ahead✨🙌🌟👌🤗

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  3. Bahut sundar..✍️ Prachi ji..🙏👌😊

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