लेखन का आनंद:डिजिटल युग में पत्रों का महत्व।

आज के इस आधुनिक दौर में सबसे अधिक यदि कोई व्यथित है तो वह है लेटरबॉक्स टंगा हुआ दीवार पर सोच रहा है कि काश प्रेम के उन खातों का दौर शुरू हो पता और फिर से अपनों को लिखे जाते प्रेम पत्र क्योंकि असंख्य अपनत्व से वंचित लोग आज भी उन प्रेमपत्रों के इंतजार में हैं। पर डिजिटलीकृत होते हम अब कहां इतना सोच पाते हैं। A.I के इस ज़माने में अब हम कहां इतना समझना चाहते हैं। अब किसे फ़िक्र है उन असंख्य अपनत्व से वंचित लोगो की? दो मिनट में खुशियां वाली दुनिया में कौन अब कलम और कागज़ पर अपने विचारों को लिखकर प्रेषित कर पाने की ज़हमत उठाएं। 90 सेकंड के इमोशंस (रिल्स) के इस दौर में अब हम कुछ इस क़दर बहते जा रहे हैं कि हमें इसका कोई छोर नहीं दिखाई देता तो फिर कौन अपना स्पर्श देकर एक पत्र लिखने की जद्दोजहद उठाए।
    अब हम सभी डिजिटल युग के प्रभारी हैं, हर काम डिजिटल माध्यम से बड़ी आसानी से हो जाता है जो हमारा समय ओर श्रम दोनों को बचा लेता है और फिर हम मनुष्य अपनी आदतों के मारे जहां सहूलियत दिखे वहां दौड़े चले जाते हैं भले बदले में हमें उसकी कितनी ही बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े इसकी हमें कुछ खास परवाह नहीं रह जाती। ऐसा ही कुछ प्रतीत होता है लेखन , पत्र लेखन की विधा के साथ भी और ज़हन में उठती हैं जावेद जी की यह दो पंक्तियां ।
     " ख़्वाब में था जो वो पा लिया मगर 
          खो गई वह चीज क्या थी। "
कलम, कागज़ और दवात हो या पत्र और पत्राचार हो उनका युग खोता जा रहा है। जहां पत्रों पर अपने कलम के शब्दों में प्रेम,आदर,समर्पण और निष्ठा की स्याही से अपने भावों को प्रेषित करते थे फिर बड़े ही प्रेम से सहेजकर उसे लेटरबॉक्स में डाल आते और फिर इंतज़ार का वह दौर शुरू होता की कब पत्र हमारे प्रियजन को मिले और कब उसका जवाब हमे भेजें। शायद डिजिटलीकृत होता युग उस दौर की इंतज़ार की सुख अनुभूति को धूमिल करता जा रहा है। आज चाहे कितनी ही जल्दी संदेशों को प्रेषित करने में वह हमेशा पत्रों की दुनिया से पीछे रहेगा। ख़त पढ़ते समय उसमें लिखे शब्दों में छिपी भावनाओं को हम आज के संक्षिप्त और सूक्ष्म जमाने में नहीं समझ पाएंगे।
    पत्र में लिखे वाक्य को पढ़कर जब हम भी हल्का मुस्करा देते थे। दुख के शब्द पढ़कर हम भी उस वेदना की सीमा की अनुभूति करते थे। वह शायद आज के ASAP(As soon as possible) वाले ज़माने में खोता जा रहा है। आज लेखन के आनंद को महसूस करने वालों की संख्या में जब कमी आती जा रही है तब गुलज़ार साहब की कविता " किताबें झांकती हैं बंद अलमारी से" की ये पंक्तियां याद आती हैं 
  " किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से,बड़ी हसरत से तकती हैं, महीनों अब मुलाकात नहीं होती,
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थी,
 अब अक़्सर गुज़र जाती हैं कंप्यूटर के पर्दों पर।"
लेखन और खासकर पत्र लेखन का भी यहीं हाल -ए- अंजाम हुआ है डिजिटल युग में। फोन की स्क्रीन और हमारी उंगलियों का जब से नाता जुड़ा मानों हम सारे नाते ही भूल गए। अब कहाँ कोई पत्रों में लिखे गए शब्दों में किसी के स्पर्श को महसूस कर पाता है? अब सोशल नेटवर्किंग के दुनिया में भला कौन पोस्ट ऑफिस तक जाने की जहमत उठा पता है। जहां कुछ सेकेंडों में संदेश पहुंच जाते हो वहां कौन पोस्ट ऑफिस की लंबी कतारों में प्रतीक्षा कर पाता है। लेकिन इन सुविधाओं के चंगुल में हम जिस क़दर जकड़ते का रहे है वह भी कम मूल्यवान नहीं है।
    पत्रों के दौर ओर पत्र लेखन की सच में कुछ खास बात थी। आज जहां ढेरों पासवर्ड और डिजिटल सिक्योरिटी होने के बावजूद भी हमारे संदेशों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पाती है। वहीं पन्नों के दौर में पत्रों की अपनी मर्यादा होती थी जिसे हर कोई जानता भी था।
     डाकिया भी जानता था की पत्र किसका है और किसके हाथ में पहुंचाना आवश्यक है और कितने समय में पहुंचाना है, उन रूठी प्रेमिकाओं के पत्र, बूढ़ी मां की याद में बेटे का पत्र, बहन की राखी पर भाई का पत्रों की भावनाओं के अहसास की जगह शायद ही डिजिटल युग कभी ले पाएगा। 
 जिस देश में 'पिता का पत्र, पुत्री के नाम' के द्वारा एक पिता जिदंगी के कहीं सबकों से अपनी पुत्री को रूबरू करवाते हैं, उसी देश से पत्रों और पत्र लेखन का यूं ओझल होना शोभा नहीं देता। आइए मिलकर फिर से पत्रों की प्रतिष्ठा के लिए कदम बढ़ाए ओर प्रयास करें।

"कलम रही न दवात,
 हाथ में आया नया आविष्कार,
 डिजिटल युग की अपनी माया में,
 कैसे पीछे छूटा पत्राचार।"

प्राची डिमरी 

Comments

  1. Keep it up dear.May God bless you bachaa. Keep shining 🤗✨🌟

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  2. वाह प्राची जी...क्या कहने हैं... उम्दा 👌👌✍️

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