गांव

जब भी मैं गांव लौटती हूं,
जुड़ जाती हूं फिर से अपनी
जड़ों से....
दिख जाते हैं कई छिपे हुए  सपने माता पिता के आंखों में,
सुनाई पड़ती हैं वो सारी अनकही बाते और ख्वाहिसे जिनको वे पूरा करना चाहते हैं,
दिखते है वीराने होते गांव के सुंदर सुंदर घर,
दिखते हैं सूखते हुए पेड़ और जलता हुआ जंगल,
दिखाता है एक बदलता हुआ गांव शहर के वास्ते,
दिखता है एक खाली होता गांव जो शहरों की ओर रूख़ कर चुका है,
दिखती हैं बचपन की वो सारी मस्ती भरी शरारते,
दिखते है वो सारे बचपन के यार जो ज़िन्दगी की जद्दोजहद में कहीं खो चुके हैं,
दिखता है रेत की तरह फिसलता हुआ जीवन जो बदल रहा है हर क्षण हर पल....!

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