गांव

  "गांव"

उम्मीदों की खिड़की,
 एक दिन फिर से खुलेगी।
खुशियों के दरवाजे
एक दिन फिर खुलेंगे।
एक दिन इन वीरान गावों में,
फिर से राहगीर आएंगे।
एक दिन यह सूखे पड़े खेत,
फिर से लहलाएंगे।
एक दिन किस्मत के दरवाज़े 
फिर से खुल जायेंगे।
बच्चों की वो शैतानियां,
फिर से नज़र आएंगी
दादा दादी की वो कहानियां,
फिर से हमें भाएंगी।
शहरों की भागदौड़ से परे
फिर से गांव की शांति पसंद आएगी।
व्यस्तता के जीवनशैली में,
फिर से गांव का सुकून याद आएगा।
शहरों की बड़ी बड़ी इमारतों में,
फिर से गांव की गलियां याद आयेगी।
जीवन की कहानी के कई किस्सों के बावजूद,
फिर से वो स्वर्णिम दिन याद आयेंगे।
शहरों में सपनों के लिए लड़ते लड़ते,
फिर गांव की स्वछंदता याद आयेगी।
खुद तक सिमटती दुनिया में,
फिर से गांव का वो अपनापन याद आएगा।
त्योहारों पर गांव का यह विरानापन,
फिर से एक दिन भाग जाएगा।
अपनी जड़ों और अपने वजूद की अहमियत
फिर से हमको याद आयेगी।
एक दिन गावों का यह सूनापन,
फिर से मिट जाएगा।
फिर से अपने जंगल,अपने खेत खलियान,अपना गांव हमें भाएगा,
एक दिन फिर से गांव, गांव जैसा बन जाएगा....!


 प्राची डिमरी

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