शहर

"शहर"
गांव के छोटे-छोटे सपनों को पंख लगाने,
अपनों की उम्मीदों को सच कर जाने,
छोटी-छोटी चाहतों को बड़ी-बड़ी हकीकतों में बदलने,
गांव की पगडंडियों से शहर की चौड़ी सड़कों को पाने,
निकलता है जब कोई युवा अपने हिस्से का आसमां पाने,

मुट्ठी भर उत्साह और ढेर सारा अपनों का प्यार,
आशा और उम्मीदों से भरी पोटलियां लेकर,
अपनी मंज़िल की ओर कदम बढ़ाता है,
अपने हृदय को मजबूत बनाकर,
अपनों के खातिर, अपनों से जुदा हो जाता है।

पर आसान नहीं होती उसकी वह राह,
शहर लेता हैं परीक्षा उसकी कई बार,
कभी समाज का प्रश्नचिन्ह तो,
कभी खुद का ही आत्म संदेह बन कर,
जकड़ती हैं हृदय को भावनाएं कई बार,

पर हिम्मत वो भी कभी नहीं हारता है,
खुद चाहे कितना भी टूटे पर अपनों की आश नहीं तोड़ता है,
कभी हासिल करता है अपने सपनों का जहां,
तो कभी उन्हें पाने की राह में नया जहां रच जाता है,
अनजाने में ही वो लाखों के सपनों के लिए आदर्श बन जाता है,

वो सिखा जाता है सबको की,
जीवन की रणभूमि में ,
कभी हथियार नहीं डालने हैं,
लाख हो मुश्किलें पर कभी हिम्मत नहीं हारनी है।

यही है वह सीख जो कृष्ण गीता में देते हैं,
अनजाने में वो गांव का युवा हमें दे जाता है,
जिसने कभी हथियार नहीं डाले,
अंत में योद्धा वही कहलाता है,

ठन जाए किस्मत से या हो रण विशाल,
जीत हमेशा होती है उसकी,
जिसके इरादों में हो जान,
भरकर आत्मविश्वास खुद में,
वो भरता है नई उड़ान..,

एक छोटे से गांव का युवा,
शहर की उस भीड़ में अपना अस्तित्व खोज लेता है,
अपने पथ पर चलकर,
अपनी मंज़िल को खोज लेता है...।

प्राची डिमरी
रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड)

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