यूटोपिया
यूटोपिया यानी कल्पनादर्श, किसी भी वस्तु का कल्पनादर्श होना जितना कठिन है उतना ही कठिन है हमारी कल्पनाओं पर लगाम लगाना। वास्तव में हमारी कल्पनाएं ही हैं जो हमारे जीवन की वास्तविकता बनती हैं। हमारी कल्पनाएं पता नही कब एक यूटोपिया में बदल जाती हैं हमें पता ही नहीं चलता। हमारी कल्पनाएं कब भ्रम बन जाती हैं हमें उसका भी बोध नहीं होता। और जब हमारी वास्तविकता उसके अनुकूल नहीं होती है तब वही हमारे दुख और अवसाद का कारण बन जाता है।
कल्पनाएं करना जितना सुखद और आसान है उन्हें यथार्थ में बदल पाना उतना ही मुश्किल तो कुछ विशेष परिस्थितियों में नामुमकिन भी हो जाता है किंतु यह सोचकर हम कल्पना करना छोड़ दे यह भी उचित नहीं है। उचित यदि है तो वह यह की हम अपनी कल्पनाओं के घोड़ों को यथार्थ की जमीन से ज्यादा दूर न होने दे।
यदि कल्पना कुछ पाने की है तो उसे पाने के लिए प्रयत्न भी करें। वैचारिक स्तर से बढ़कर उसे कर्म में तब्दील करें।
कल्पनाओं का संसार हमारा मन हमेशा ही रचता है किंतु उसमें यथार्थता की छीटें समय समय पर मारते रहने का काम हमें स्वयं ही करना होगा। यह जीवन को न केवल आसान बनाता है बल्कि हर पर परिस्तिथि में हमारे संतुलन को भी बनाए रखता है।
कल्पनादर्श होना कुछ हद तक तो सही है किंतु उसी से हर क्षण अपने जीवन की तुलना करना यह सही नहीं है। यदि खुद के रचे यूटोपिया से बाहर निकलकर यदि हम जीवन को समझने की कोशिश करें तो हमें जीवन की हर परिस्थिति से कुछ न कुछ सीखने को मिलेगा। हम जीवन को अधिक विस्तार से देख पाएंगे और उसका और अधिक आनंद भी उठा पाएंगे। तब हम समझ पाएंगे जो कुछ भी हमारे विरोध में जीवन कर रहा है वह हमें नष्ट करने के लिए नहीं बल्कि हमें पहले से और मजबूत बनाने के लिए हो रहा है। क्योंकि मजबूती और साहस हमेशा विपरीत परिस्थितियों से लड़कर ही मिलती है।
तो फिर क्यों न इस यूटोपिया से बाहर निकलकर जीवन का आनंद लिया जाए। जो हो रहा है उसे खुले हृदय से स्वीकारा जाए और हिंदी फिल्म के इस गीत को गुनगुनाकर जीवन को खुलकर किया जाए....
" जिंदगी एक सफ़र है सुहाना....."
प्राची डिमरी
👏👏👏👏 nice
ReplyDeleteThank you 😊✨
DeleteYou are strong with your pen 👏👏👏
ReplyDeleteThank you 😊✨
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