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Showing posts from October, 2023

शहर

" शहर " गांव के छोटे-छोटे सपनों को पंख लगाने, अपनों की उम्मीदों को सच कर जाने, छोटी-छोटी चाहतों को बड़ी-बड़ी हकीकतों में बदलने, गांव की पगडंडियों से शहर की चौड़ी सड़कों को पाने, निकलता है जब कोई युवा अपने हिस्से का आसमां पाने, मुट्ठी भर उत्साह और ढेर सारा अपनों का प्यार, आशा और उम्मीदों से भरी पोटलियां लेकर, अपनी मंज़िल की ओर कदम बढ़ाता है, अपने हृदय को मजबूत बनाकर, अपनों के खातिर, अपनों से जुदा हो जाता है। पर आसान नहीं होती उसकी वह राह, शहर लेता हैं परीक्षा उसकी कई बार, कभी समाज का प्रश्नचिन्ह तो, कभी खुद का ही आत्म संदेह बन कर, जकड़ती हैं हृदय को भावनाएं कई बार, पर हिम्मत वो भी कभी नहीं हारता है, खुद चाहे कितना भी टूटे पर अपनों की आश नहीं तोड़ता है, कभी हासिल करता है अपने सपनों का जहां, तो कभी उन्हें पाने की राह में नया जहां रच जाता है, अनजाने में ही वो लाखों के सपनों के लिए आदर्श बन जाता है, वो सिखा जाता है सबको की, जीवन की रणभूमि में , कभी हथियार नहीं डालने हैं, लाख हो मुश्किलें पर कभी हिम्मत नहीं हारनी है। यही है वह सीख जो कृष्ण गीता में देते हैं, अनजाने में वो गांव का य...

यूटोपिया

यूटोपिया यानी कल्पनादर्श , किसी भी वस्तु का कल्पनादर्श होना जितना कठिन है उतना ही कठिन है हमारी कल्पनाओं पर लगाम लगाना। वास्तव में हमारी कल्पनाएं ही हैं जो हमारे जीवन की वास्तविकता बनती हैं। हमारी कल्पनाएं पता नही कब एक  यूटोपिया में बदल जाती हैं हमें पता ही नहीं चलता। हमारी कल्पनाएं कब भ्रम बन जाती हैं हमें उसका भी बोध नहीं होता। और जब हमारी वास्तविकता उसके अनुकूल नहीं होती है तब वही हमारे दुख और अवसाद का कारण बन जाता है।    कल्पनाएं करना जितना सुखद और आसान है उन्हें यथार्थ में बदल पाना उतना ही मुश्किल तो कुछ विशेष परिस्थितियों में नामुमकिन भी हो जाता है किंतु यह सोचकर हम कल्पना करना छोड़ दे यह भी उचित नहीं है। उचित यदि है तो वह यह की हम अपनी कल्पनाओं के घोड़ों को यथार्थ की जमीन से ज्यादा दूर न होने दे। यदि कल्पना कुछ पाने की है तो उसे पाने के लिए प्रयत्न भी करें। वैचारिक स्तर से बढ़कर उसे कर्म में तब्दील करें।    कल्पनाओं का संसार हमारा मन हमेशा ही रचता है किंतु उसमें यथार्थता की छीटें समय समय पर मारते रहने का काम हमें स्वयं ही करना होगा। यह जीवन को न केवल ...