प्रेमचंद और स्त्री विमर्श ।

पिछले महीने 31 जुलाई को 'कलम के सिपाही' और हिंदी साहित्य के अग्रणी लेखकों में शुमार मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती को हम सभी ने मनाया। यूं तो उनके विचारों की प्रसंगिकता समाज में आज भी उतनी ही है जितनी की 100 वर्षों पहले थी लेकिन जब हम आज उन्हें पढ़ते हैं तो उनकी कहानियों और रचनाओं में जो स्त्री विमर्श की गहराईया मिलती हैं वो हृदय और मस्तिष्क दोनों को झकझोर कर देती है। वह चाहे 'कफ़न' हो, 'गोदान' हो या उनकी लिखी कहानी 'आधार' हो इन सभी में उन्होंने महिलाओं की जिस स्थिति का चित्रण किया है वह हृदय को कुरेद देता है और यह सोचने पर विवश करता है की क्या आज भी समाज की इस दशा में कोई सुधार आया है ? क्या महिलाएं आज अपने लिए खुद निर्णय लेने में सक्षम हैं? क्या आज भी उन्हें खुद से पहले समाज के प्रति सोचना पड़ता है?
   उनकी कहानी आधार को ही ले उसमें जिस तरह से दो महिलाओं की एकता समाज के प्रश्न चिन्हों के आगे आकर ठोस जवाब बन जाती है यह वास्तव में पाठक को सुकून से भर देता है और खुद एक दूसरे का मजबूत आधार बन कर समाज के दायरों से आगे निकल जाती हैं यह बयां करता है की यदि महिलाएं खुद एक दूसरे की ताकत बने तो उनके आगे कोई भी संदेह और समाज की बेड़ियां नहीं टिक सकती, वह अपनी ढाल खुद बनकर अपनी समस्याओं से पार पा सकती हैं। 
    प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में महिलाओं पर और उनकी स्थिति पर विशेष ध्यान दिया है। वे हमेशा महिलाओं के सम्मान को एक सभ्य समाज की निशानी मानते रहे। वे हमेशा महिलाओं के दैनिक संघर्षों से लेकर सामाजिक संघर्षों को रेखांकित करते रहे। तभी तो वे अपने अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास 'गोदान' में लिखते है -"जब पुरुष में नारी के गुण आ जाते हैं तो वो महात्मा बन जाता है। "
     प्रेमचंद महिलों को उनके गुणों के आधार पर हमेशा पुरुषों से श्रेष्ठ मानते थे। उनके लेखन के इतने सालों बाद भी उनकी कलम की स्याही का रंग और उनके अक्षरों का अर्थ आज भी उतना ही गहरा है। आज भी कई बूढ़ी काकी जैसी महिलाएं दो वक्त की रोटियों के लिए तरसती हैं। उनके लेखन की प्रासंगिकता आज भी है यह कुछ मायनों में हर्ष का विषय है तो कई मायनों में आत्ममूल्यांकन का भी की इतने वर्षों बाद भी हमारे समाज की व्यवस्थाओ और विचारों में कोई बदलाव नहीं आया। यह बदलाव कब तक आएगा और कितनी जल्दी आएगा यह हम सब पर ही निर्भर करता है क्योंकि हम सभी से ही समाज बनता है जितनी जल्दी हम खुद की सोच और विचारों का दायरा बढ़ायेंगे उतनी जल्दी हमारा परिवर्तन से परिचय होगा। 

"एक तपती दोपहर है नारियों की जिंदगी,
एक पथरीली डगर है नारियों की जिंदगी,
चाहे हो अग्नि परीक्षा या चौसर की बिसात,
हर सदी में दांव पर है,नारियों की जिंदगी...!"


प्राची डिमरी

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