थैंक यू.....!

थैंक यू यानी साधुवाद यह शब्द न जाने आजकल हम एक ही दिन में कितनी बार बोलते होंगे और किस किस से बोलते होंगे। लेकिन जो इसके असली हकदार होते हैं काश! हम कभी उन्हें भी बोल देते। घर हो या समाज जो लोग अपना काम बिना कहे ही कर देते हैं हम मानो उनकी कद्र करना ही भूल जाते हैं। उनकी महत्ता को ही अनदेखा कर देते हैं।
     यदि समाज में ही देखे तो ऐसे अनेक लोग हैं जो यदि न होते तो हमारी जिंदगी अभी जितनी आसान हो गई है उतनी शायद ही कभी हो पाती। किंतु प्रश्न यह है की हम इस पर कितना सोच पाते हैं?
     आज कल की ही बात ले लीजिए हम सभी जानते हैं की बरसात का दौर है हर तरफ बारिश और पानी का कहर जारी है, कहीं जल भराव तो कहीं भूस्खलन। यदि हमारे पहाड़ों की ही बात करें तो यातायात का बाधित होना हमारी सबसे प्रमुख समस्या बन जाती है सड़कों का टूटना या अवरूद्ध होना, गाड़ियों का लंबे लंबे कतारों में जाम में फंसे होना। यूं तो यह सब मौसम की देन, प्रकृति का कहर और हमारे ही कृत्यों का परिणाम है किंतु यदि इसी के दूसरे पहलू पर नज़र डाले तो सचमुच हृदय सहानुभूति की भावना से भर जाता है मन एक विलक्षण भावना से गदगद हो जाता है जब हम देखते हैं की इतनी सारी समस्याओं के बाद भी कुछ लोग हैं जो हमारे लिए उस बारिश में भी खड़े हैं, कुछ लोग हैं जिनके लिए उनकी सुरक्षा से बढ़कर हमारी सुरक्षा है, जिनको भीषण बारिश का कहर और प्रतिकूल मौसम की घटनाएं भी उनके कर्तव्य से वंचित कोई नहीं करते। ये वहीं लोग हैं जिनकी महत्ता को हम ज्यादा रेखांकित भी नहीं करते और जब वे हमारे लिए कार्य करते हैं तो हम यहीं सोचते हैं क्या फर्क पड़ता है यह तो इनका काम है लेकिन यदि थोड़ी गहराई और सहानुभूति से सोचे तो मन सच में उनके प्रति एक गहरी आदर की भावना से भर जाता है।
     हमारे अपने उत्तराखंड में ही देख लीजिए आज कल जब हर जगह सड़के अवरूद्ध हो रहीं हैं या गाड़ियों के मार्ग अवरूद्ध हो रहें है तो तत्काल JCB कर्मी और पुलिस कर्मी , मजदूर वर्ग और प्रशासन हमारे लिए हाज़िर हो जाते हैं। हम तो केवल दूर से उन्हें देख बस बैठकर इंतजार में रहते हैं की कब क्षतिग्रस्त सड़क दुरुस्त हो और कब हम निकले लेकिन यदि थोड़ा उनके बारे में सोचे की कैसे वे उपर से पत्थर, मलबा, पेड़ गिरने के भय के बावजूद भी हमारे लिए अपना कर्तव्य अदा कर रहे हैं। हां माना की हम यह कहकर टाल सकते हैं की हर किसी का अपना-अपना कार्य होता है और उसकी अपनी-अपनी चुनौतियां तो इसमें क्या बड़ी बात लेकिन ज्यादा न सही तो हम इनके कार्य और समर्पण के प्रति तो अपने मन में सहानुभूति और आदर की भावना को ला सकते हैं। कुछ और न सही पर थैंक-यू  इन्हें भी तो कह सकते है बदले में और कुछ न सही पर उनके दिल को जो खुशी की अनुभूति होगी वो सच में अद्वितीय होगी। वास्तव में निम्नलिखित लोकोक्ति की पंक्तियां समाज की एक कड़वी सच्चाई को व्यक्त करती हैं----

" निर्धन गिरे पहाड़ से, कोई न पूछे हाल,
धनी को कांटा लगे, पूछे लोग हजार। " 


प्राची डिमरी

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