बालश्रम

                     बालश्रम
जीवन की किताब का सुंदर अध्याय होता है बचपन,
भविष्य की इमारत की नींव होता है बचपन।

हमारी उभरती तस्वीर का कैनवास होता है बचपन,
हर बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार होता है बचपन।

फिर क्यों आज भी कई बच्चों का बचपन छीन जाता है,
खेल खुद से दूर क्यों बालश्रम में बंध जाता है।

नासमझी की बाल उमर में न जाने क्या क्या झेलते हैं,
काम के बोझ तले वो खुद को भी खो देते हैं।

जीवन का सुंदर अध्याय नहीं रह जाता अब सुंदर,
मौज मस्ती, खेलकूद छोड़ याद आता बस बालश्रम।

छोटी से उस उमर में वे बड़ों सी मेहनत करते हैं,
बचपन के वे काले साए उनके भविष्य पर भी पड़ते हैं,

उस निर्मल मन में न जाने क्या-क्या प्रश्न उठते होंगे,
समाज की इन कुरीतियों से न जाने कितने मासूम प्रभावित होते होंगे,

उनकी आंखों से बहा हर एक आंसू समाज के लिए श्राप है,
उनका बचपन छिनने वाला समाज सबसे बड़ा गुनेहगार है।
 
सपने उनके भी थे बड़े बड़े,
जिनको हम सबने ही तोड़ा है।

अपने बच्चे का बचपन संवार कर,
किसी और का बचपन छीना है।

दीमक की भांति यह कुरीति समाज को ही चाटेगी,
 वक्त रहते यह हम सबको है समझना।

उनका जो अधिकार है,उससे उन्हें न वंचित करें,
नई सोच और नए प्रण से, नए समाज का संकल्प करें।।

प्राची डिमरी

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