बेवजह की व्यस्तता में लुप्त होती अदभुत्ता।
जिंदगी छोटी छोटी घटनाओं का एक बड़ा संग्रह है। लेकिन जब बढ़ती व्यस्तता में हम इन छोटी चीजों का महत्व खो रहे हैं तब कहीं न कहीं हम जीवन में समाहित अदभुता को भी खोते जा रहे हैं। क्या अपने कभी सोचा है की व्यस्तता भरे इस दौर में आप अपने खुद के लिए कितना समय बचा पाते हैं? हाल तो अब कुछ इस कदर हो गया है की चाहे हम दिन भर भी खाली हो तब भी अपने लिए वक्त की कमी ही पाते हैं। न जाने यह व्यस्तता के मारे है या फिर हमारे अपनी अव्यवस्थित दिनचर्या के कारण, कारण जो भी हो पर यह हमें जीवन के गहरे उतरने, जीवन को समझने से निश्चित रूप से बाधित कर रहा है।
हम इसी छ्दम व्यस्तता के कारण लम्हों को जीते नहीं बल्कि मात्र काटते चले जाते हैं। और तो और कभी कभी तो अपनी खुशियों का भी पूरी तरह आनंद नहीं ले पाते हैं और उन्हें भी भविष्य के लिए संरक्षित कर देते हैं की जब वो क्षण आएगा, जब मेरे पास वक्त होगा तब मैं पूरा आनंद लूंगा। लेकिन यह हमें उन अमूल्य क्षणों से हमेशा के लिए दूर कर देता है। जो शायद कभी लौटकर वापस भी नहीं आ सकते।
जीवन की हर छोटी चीज विलक्षण होती है किंतु यह जानने में हमें समय लगता है। प्रकृति में छुपे कई सारे रूपों को समझने के लिए हमें पहले खुद को समझना होता है। बेवजह की व्यस्तता इसमें सबसे बड़ी बाधा बनती जा रही है।
बेवजह सड़कों पर गाड़ियों को यूं ओवरटेक करना।
चलते समय भी हमारा यूं मोबाइल फोनों में घुसे रहना।
करने के लिए बहुत कुछ होने के बाद भी हमारा बस सोशल मीडिया में ही घुसे रहना। मोबाइल के सामने आते ही आस पास सबको भूल जाना। किताबों का पढ़े पढ़े अलमारी में ही दम तोड़ देना। यह सब कुछ इस व्यस्तता की ही देन है जिससे कहीं न कहीं हम में से कोई भी अछूता नहीं है।
अब वक्त आ गया है की हम थोड़ा ठहरकर चिंतन करें। अपनी दिनचर्या और जिंदगी से इस बे फ़िज़ूल की व्यस्तता को हटाने की कोशिश करें और जीवन में संतुलन लाने की कोशिश करें।
प्राची डिमरी
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