नारी तुम श्रद्धा हो..!
आज की 21 वीं सदी में जब हम महिलाओं की भूमिका की बात करते हैं तो हर क्षेत्र में हमें महिलाओं का वर्चस्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है किंतु वहीं दूसरी ओर यदि हम आज से कुछ वर्षों पहले की महिलाओं की समाज में स्थिति के बारे में पढ़ते या सुनते हैं तो हमारा खुद को सौभाग्यशाली मानना बिल्कुल तर्कपूर्ण लगता है की हम 21 वीं सदी की बेटियां हैं क्योंकि इससे पहले नारी जिस वेदना का सामना करती थीं वह ह्रदय को करुणा से भर देता है।
आज समाज में नारी का जो स्थान है, हर क्षेत्र में नारी की जो योगदान है वह वर्षों पहले एक कल्पना मात्र थी।
21 वीं सदी में आज जब हम प्राचीन महिलाओं के विरुद्ध की प्रथाओं, रूढ़िवादी विचारधाराओं और महिलाओं के लिए समाज के तथाकथित नियमों और कानूनों के बारे में पढ़ते हैं तो यह हमें विचार करने के लिए मजबूर कर देता है की कैसे महिलाओं को एक मामूली मनुष्य के अधिकारों सेे भी वंचित किया जाताा था। कैसे समाज के लिए उन्हें हमेशा अपनी इच्छाओं और स्वतंत्रता का त्याग करना पड़ा।
हालांकि अब परिस्थितियां बदल रहीं हैं काफी कुछ बदल भी चुका है। किंतु आज भी मानसिकता में जो सकारात्मक परिवर्तन की हम उम्मीद करते हैं वह आज भी हासिल नहीं हुए हैं।
प्राचीन काल में नारी जहां आदिशक्ति के रूप में पूजी जाती थीं वहीं हिंदी साहित्य ने तो नारी को श्रद्धा का ही उपमा दे दी। जयशंकर प्रसाद जी की कविता "नारी तुम श्रद्धा हो " नारी का एक सटीक वर्णन करती है। वहीं दूसरी ओर आज भी समाज में ऐसी घटनाओं की भरमार हैं जो हमारे महिला सशक्तिकरण पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर देता है।
आज जहां महिलाएं विज्ञान, अंतरिक्ष, खेल, शोध, संगीत, अभिनय और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में अग्रणी स्थान हासिल कर चुकी हैं वहीं आज भी कभी न कभी महिलाओं की कोमलता को उनकी कमजोरी का पर्याय माना जाता है। दैनिक जीवन की सामान्य सी घटनाएं हो या सार्वजनिक घटनाएं हो महिलाएं आज भी कहीं न कहीं भेदभाव का सामना करतीं हैं। आज भी ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में महिलाएं अपने स्वास्थ्य और शिक्षा के प्रति पूर्ण रूप से जागरूक नहीं हैं। कईं महिलाएं आज भी अपनी जिम्मेदारियों के लिए अपनी पढ़ाई और अपने काम को छोड़ देती हैं। आज भी परिवार में अपने मत रखने के लिए महिलाओं को विरोधों का सामना करना पड़ता है।
समाज बदल रहा है निश्चित रूप से नई दिशा में बढ़ रहा है। महिलाओं के हितों की बात कर रहा है उनके प्रतिनिधित्व को सराहना दे रहा है किंतु यह परिवर्तन तभी कारगर होगा जब हर वर्ग की महिलाओं की इनमें हिस्सेदारी हो। हर वर्ग की महिलाएं इनसे वाखिफ़ हो। जब महिलाएं खुद अपने विकास की जिम्मेदारी को समझकर उसके लिए कदम भी उठाएं।
किसी भी परिवर्तन के प्रति आशावादी होना हमारी सकारात्मक को ही दर्शाता है तो चलिए महिला सशक्तिकरण और महिला हितों की दिशा में भी आशावादी बनकर अपने लिए खुद कदम उठाकर देखते हैं और समाज को समानता से सजाते हैं। नारी को उसका अधिकार दिलाते हैं।
प्राची डिमरी
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