प्रकृति और हम
"प्रकृति में गहरी नजरों से देखो और तब आप हरेक चीज को अच्छे से समझेंगे।" --- अल्बर्ट आइंस्टीन
क्या हम कभी सोचते हैं की जिस खुली हवा और खुले वातावरण में हम रह रहें हैं उसे बचाऐ रखना कितना जरूरी है? क्या हम कभी वास्तविकता में अपने और प्रकृति के संबंध और संतुलन के बारे में सोचते हैं? शायद नहीं और अगर कुछ लोग सोचते भी हैं तो उस दिशा में कितने कदम उठा पाते हैं यह चिंतनीय है।
सृष्टि में हर वस्तु संतुलन के आधार पर टिकी है संतुलन के थोड़ा सा बिगड़ते ही बड़े-बड़े नुकसान और हानियां हो जाती है। जितना आसान संतुलन के बारे मे कहना या सुनना है उतना ही मुश्किल है इसे बनाए रखना फिर चाहे वो जीवन हो या प्रकृति।
विकास की राह पर बढ़ते हमारे कदम कहीं न कहीं हमारे इस संतुलन को बिगाड़ने का कारण बनते जा रहे हैं। हम अपने लाभ के लिए प्रकृति का दोहन करते ही जा रहे हैं इस सब के बीच हम यह भूल रहे हैं की जिस प्रकार हमें अपने स्व की चिंता है उसी प्रकार प्रकृति भी अपने मैं और मेरो की फिक्र करती है और अपने संतुलन का बीड़ा खुद उठाती है।
प्रकृति हमें विभिन्न संकेतों के माध्यम से चेतावनी देने का प्रयत्न करती है किंतु आगे बढ़ने की होड़ में हम सब कुछ देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। अपने हित के लिए हम प्रकृति के हित से समझौता कर लेते हैं और बाद में यही समझौता हमारे विनाश का कारण बनता है।
यही समझौता हमारे अनियोजित विकास को तहस नहस कर जाता है। जिस विकास को पाने में हम सालों साल लगा कर हर क्षण प्रकृति में हस्तक्षेप कर रहे हैं उसे फिर से संतुलित करने में प्रकृति को क्षण भर का समय भी नहीं लगता।
भारतीय संस्कृति में प्रकृति को ईश्वर और आध्यात्म से जुड़ने का एक रास्ता माना जाता रहा है किन्तु जब हम उस रास्ते को ही नष्ट कर देंगें तो फिर मंज़िल की प्राप्ति तो मात्र एक सपना ही है। प्रकृति और प्रकृति से जुड़ी हर एक चीज हमारे जीवन के हर पहलू से जुड़ी है फिर चाहे वो हमारा शारीरिक स्वास्थ्य हो या मानसिक स्वास्थ्य, प्रकृति से जुड़ाव हर पहलू में हमारे लिए कारगर सिद्ध होता है। प्रकृति को अनदेखा करना एक प्रकार से खुद के अस्तित्व को ही अनदेखा करना है। इसी अनदेखेपन का नतीजा आज हमें वर्तमान में हमारे उत्तराखंड के शहर जोशीमठ में भी देखने को मिल रहा है। खूबसूरत वादियों, आध्यात्मिकता और पर्यटन के लिए मशहूर यह शहर किस प्रकार अपने सपनों को और अपने घरों को खोने का दंश सह रहा है यह हम भली भांति जानते हैं। प्रकृति को नज़रंदाज़ करने का ही नतीजा है की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और रणनीतिक लिहाज से अपनी अहम भूमिका निभाने वाला खूबसूरत शहर जोशीमठ आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है । अनियोजित विकास के चलते आज जोशीमठ के लोग अपने ही शहर में शरणार्थी की तरह जीने के लिए मजबूर हो गए हैं। प्रकृति के साथ किए खिलवाड़ ने आज उन्हें विस्थापितों की श्रेणी में खड़ा कर दिया।
हम अकसर भूल जाते हैं प्रकृति और हम अलग नहीं बल्कि एक ही हैं हमारे हर एक कदम का प्रभाव प्रकृति में पड़ता है। प्रकृति का एक अभिन्न हिस्सा होने के नाते यह हमारा भी नैतिक कर्तव्य बनता है की हम अपनी जरूरतों को अपने लालच में बदलने से रोकें, अपनी सुरक्षा के लिए प्रकृति और उसकी विविधता के साथ हस्तक्षेप को रोकें। हमें जो कुछ भी प्रकृति द्वारा प्रदत्त है उसका महत्व समझें और प्रकृति की सुरक्षा के लिए सदैव प्रयत्नशील रहें। प्रकृति के ऋण से उऋण होना संभव नहीं है किंतु उसके संरक्षण में अपनी कुछ भागीदारी देकर हम खुद को आत्मसंतोष से तो भर ही सकते हैं। जिस प्रकार हमें अपने जीवन की एकरूपता और नीरसता को दूर करने के लिए विविधता की चाह होती है शायद इसीलिए प्रकृति भी अपनी विविधता को बचाने के लिए सदैव आगे आती है। प्रकृति की यही विविधता हमें सिखाती है की सृष्टि के हर एक प्राणी, हर एक संरचना, हर एक कृति खुद में विशिष्ठ है।
प्रकृति सचमुच एक खुली किताब की भांति है जिसका हर एक पन्ना हमसे कुछ कहता है हमारे हर एक सवालों का जवाब लिए रहता है। हम जितना प्रकृति से जुड़ते जायेंगे जीवन में आनंद के उतने ही करीब खुद को पाएंगे। हमारे अस्तित्व, हमारे आनंद और हमारी सुरक्षा की राह प्रकृति के संरक्षण से ही गुजरती है। प्रकृति है तो हम हैं। असल मायनों में प्रकृति मनुष्य का दर्पण है हम जैसा प्रकृति के साथ करेंगे प्रकृति भी वहीं प्रतिकिया हमें देगी और जैसे हमारे कृत्य होंगे प्रकृति हमें वैसे ही दृष्टिगत होगी।
प्राची डिमरी
Wow💫
ReplyDeleteIt seems like you have such a magical pen at your home ,huh?
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