पहाड़ की नारी 1
ममता की पराकाष्ठा, दृढ़ता है जिसकी काया, आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी छवि जो निरंतर करती है निर्मित। वह नहीं भयभीत होती पथ के सूक्ष्म रोड़ों से, वह कभी न धीरज खोती, उन विकट परिस्थितियों से। वह बन जाती है खुद का ही संबल, जब समय विषम हो जाता है, वह बन जाती है खुद का दीपक, जब तम का आग़ोस होता है। वह नहीं जानती सजना संवरना, पर कुल को वह सजाती है, वह नहीं जानती स्व के लिए जीना, पर अपने हर कर्तव्य को निभाती है, पहाड़ की विषम चुनौतियों में भी, वह सरलता से जीना जानती है, बिना किसी छुट्टी के भी हर दिन काम पर होती है। वह बना लेती है खुद को परिवार का मजबूत आधार, वह सिखा देती है खुद को दृढ़ विश्वास, वह जानती है धैर्य का द्वार कब तक पकड़े रखना है, वह जानती है कोमलता को कब तक ओढ़े रखना है, वह कई कठिन रास्तों पर चलना सीख जाती है, वह जीवन से हर बार जीतना सीख जाती है, सबकी खुशियों में अपनी खुशियां ढूंढकर, वह पहाड़ की नारी कहलाती है..!