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Showing posts from December, 2024

पहाड़ की नारी 1

ममता की पराकाष्ठा, दृढ़ता है जिसकी काया, आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी छवि जो निरंतर करती है निर्मित। वह नहीं भयभीत होती पथ के सूक्ष्म रोड़ों से, वह कभी न धीरज खोती, उन विकट परिस्थितियों से। वह बन जाती है खुद का ही संबल, जब समय विषम हो जाता है, वह बन जाती है खुद का दीपक, जब तम का आग़ोस होता है। वह नहीं जानती सजना संवरना, पर कुल को वह सजाती है, वह नहीं जानती स्व के लिए जीना, पर अपने हर कर्तव्य को निभाती है, पहाड़ की विषम चुनौतियों में भी, वह सरलता से जीना जानती है, बिना किसी छुट्टी के भी हर दिन काम पर होती है। वह बना लेती है खुद को परिवार का मजबूत आधार, वह सिखा देती है खुद को दृढ़ विश्वास, वह जानती है धैर्य का द्वार कब तक पकड़े रखना है, वह जानती है कोमलता को कब तक ओढ़े रखना है, वह कई कठिन रास्तों पर चलना सीख जाती है, वह जीवन से हर बार जीतना सीख जाती है, सबकी खुशियों में अपनी खुशियां ढूंढकर, वह पहाड़ की नारी कहलाती है..!

लेखन का आनंद:डिजिटल युग में पत्रों का महत्व।

आज के इस आधुनिक दौर में सबसे अधिक यदि कोई व्यथित है तो वह है लेटरबॉक्स टंगा हुआ दीवार पर सोच रहा है कि काश प्रेम के उन खातों का दौर शुरू हो पता और फिर से अपनों को लिखे जाते प्रेम पत्र क्योंकि असंख्य अपनत्व से वंचित लोग आज भी उन प्रेमपत्रों के इंतजार में हैं। पर डिजिटलीकृत होते हम अब कहां इतना सोच पाते हैं। A.I के इस ज़माने में अब हम कहां इतना समझना चाहते हैं। अब किसे फ़िक्र है उन असंख्य अपनत्व से वंचित लोगो की? दो मिनट में खुशियां वाली दुनिया में कौन अब कलम और कागज़ पर अपने विचारों को लिखकर प्रेषित कर पाने की ज़हमत उठाएं। 90 सेकंड के इमोशंस (रिल्स) के इस दौर में अब हम कुछ इस क़दर बहते जा रहे हैं कि हमें इसका कोई छोर नहीं दिखाई देता तो फिर कौन अपना स्पर्श देकर एक पत्र लिखने की जद्दोजहद उठाए।     अब हम सभी डिजिटल युग के प्रभारी हैं, हर काम डिजिटल माध्यम से बड़ी आसानी से हो जाता है जो हमारा समय ओर श्रम दोनों को बचा लेता है और फिर हम मनुष्य अपनी आदतों के मारे जहां सहूलियत दिखे वहां दौड़े चले जाते हैं भले बदले में हमें उसकी कितनी ही बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े इसकी हमें कु...