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Showing posts from March, 2024

शहर कुछ कहता है...!

इस शहर की खुशबू तुम हो, तुमसे महकता है ये शहर, इन वीरान कमरों में, जो तुम अपनी मेहनत का शोर भरते हो, हां सच में इसी से तुम इस शहर की आवाज़ बनते हो, जब चले जाते हो अपने अपने घरों को, तो यहां का खालीपन चिल्ला चिल्ला कर  तुम से कहता है की... जल्दी आओ.... यहां की चमक और दमक मुझे लौटाओ, त्योहारों के सूनेपन को भरने तुम तो  गांव हो आते हो... पर यहां के गली मोहल्लों की दुकानों के सूनेपन काक्या? तुम्हारे जाने का सूनापन मुझे बहुत खलता है, तुम जल्दी आओ...और मुझे लौटा दो वही भरा पूरा श्रीनगर, जो बस तुम्हारे होने से है, तुम मुझे लौटाओ मेरी चमक...  जो तुम से... तुम बस जल्दी आओ..! प्राची डिमरी (श्रीनगर शहर की खूबसूरती और पहचान यहां के विद्यार्थियों के लिए की किस तरह सूना पड़ जाता है यह शहर जब सब विद्यार्थी त्योहारों पर घर चले जाते है।वास्तव, में यहां की चमक और दमक हम ही से है।)

तू है तो....!

तू है तो ये सारा जहान है, तुझमें बसता पूरा आसमान है, तू है फौलादी, तू है उन्मादी, तू खुद में ही मिशाल है, तू है अग्नि की तपन, तो तू खुद ही समंदर विशाल है, तू है ब्रह्म  तू है महेश, तू खुद ही शक्ति अपार है, तू है धैर्य की लंबी रेखा, तो तुझ से ही तेरी उड़ान है, तू है खुद में छोटा सा दीपक तो तू ही ऊर्जा का स्रोत अपार है तू है शून्य, तू है विशाल, तू खुद में ही चमत्कार है, तू है एक छोटा सा तारा  तो तू खुद में ही पूरा ब्रह्मांड, तू है अद्वितीय, तू है असंख्य, तू खुद में ही महान है,  तू है तो ये सारा जहान है। तू है तो ये सारा जहान है। प्राची डिमरी (खुद पर यकीन करें आप कर लेंगे..!)

"विश्व कविता दिवस 2024"( कविता: विचारों की लहर और भावों की सरिता।)

        "कविता" लिखने के लिए जब मैंने कलम उठाई, तब विचारों की आपाधापी ने भी दौड़ लगाई, एक विचार इधर से आता, एक विचार उधर को जाता, कभी सोचती ये लिख लूं मैं, कभी सोचती वो लिख लूं मैं, कभी ख्वाब....तो कभी भाव लिखती, कभी खुशी .... तो कभी चैन लिखती, कभी सोचती हूं... छोड़ दूं इसको आधे में, तभी सोचती कैसे होगी पूर्ण यदि  छोड़ दिया इसको आधे में.... मैं अपनी इस दुविधा से जब उपर उठी, अपने इस टाल मटोल के चक्कर से जब आगे बढ़ी, सच कहती हूं....  तब मैंने एक कविता रची... तब मैंने एक कविता रची.... जिसे आज बरसो बाद पढ़ कर  यकीन न हुआ की..... क्या यह सुचमुच मैंने लिखी...! प्राची डिमरी सभी कविता प्रिय पाठकों को विश्व कविता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!!

गांव

  "गांव" उम्मीदों की खिड़की,  एक दिन फिर से खुलेगी। खुशियों के दरवाजे एक दिन फिर खुलेंगे। एक दिन इन वीरान गावों में, फिर से राहगीर आएंगे। एक दिन यह सूखे पड़े खेत, फिर से लहलाएंगे। एक दिन किस्मत के दरवाज़े  फिर से खुल जायेंगे। बच्चों की वो शैतानियां, फिर से नज़र आएंगी दादा दादी की वो कहानियां, फिर से हमें भाएंगी। शहरों की भागदौड़ से परे फिर से गांव की शांति पसंद आएगी। व्यस्तता के जीवनशैली में, फिर से गांव का सुकून याद आएगा। शहरों की बड़ी बड़ी इमारतों में, फिर से गांव की गलियां याद आयेगी। जीवन की कहानी के कई किस्सों के बावजूद, फिर से वो स्वर्णिम दिन याद आयेंगे। शहरों में सपनों के लिए लड़ते लड़ते, फिर गांव की स्वछंदता याद आयेगी। खुद तक सिमटती दुनिया में, फिर से गांव का वो अपनापन याद आएगा। त्योहारों पर गांव का यह विरानापन, फिर से एक दिन भाग जाएगा। अपनी जड़ों और अपने वजूद की अहमियत फिर से हमको याद आयेगी। एक दिन गावों का यह सूनापन, फिर से मिट जाएगा। फिर से अपने जंगल,अपने खेत खलियान,अपना गांव हमें भाएगा, एक दिन फिर से गांव, गांव जैसा बन जाएगा....!  प्राची डिमरी